Talash

By Jyoti Mehra
Feb 28 2019 1 min read

कांगज के टुकड़ों को समेट कर एक पन्ना बुना,लफ़्ज़ों की चादर लपेट कर एक नग़मा बुना,रिश्तों की डोर को बाँध कर कोई अपना बुना,अश्क़ो के समंदर को छोड़ कर कोई किनर बुना।बुनता रहा ज़िंदगी भर,कभी कोई अपना तो कभी कोई सपना बुना,बुनने का सिलसिला यूँही चलता रहा,ख़्वाहिशों के सफ़र में इंसान आगे बड़ता रहाएक दिन समेटे हुए कांगज के टुकड़े बिखर गयेलफ़्ज़ों की चादर नीलाम हो गयीरिश्तों को कच्ची डोर भी टूट गयी,औरअश्क़ो के समंदर का किनर भी छ

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