मैं फारिग होकर

By Mukesh Negi
Sep 23 2020 1 min read

  मैं फ़ारिग़ होकर अपना नातवां हुनर आजमाता हूं तिरे ख्याल में गाफ़िल बहुत ज्यादा मुस्कुराता हूं आब-ए-चश्म़ ने भिगो डाले ग़म-ए-इश्क़ का हाल हाय, आशिक हूं तेरा तेरी उम्मीद सजाता हूं।। क्या-क्या इत्लाफ़ नही सहे मैंने देख तो ज़रा मैं होश में होकर भी खुद को बेहोश पाता हूं।। इस कमऱ की जुन्हाई में जब भी तेरा ख़्याल आता है अपने फरिश़्तों को अपना ग़म-ए-हाल सुनाता हूं।। उनकी निगाहें ग़मख्वार हमें अपनी और बुलाती है दिल के अल्फ़ा

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