चारों तरफ छाया अंधेरा

By Mukesh Negi
Sep 25 2020 1 min read

  चारों तरफ छाया अंधेरा उम्मीद का भी है सवेरा दिलकश है बैठा एक ऊपर जो दे रहा हरवक्त पहरा।। मायूस न होना जग में रहकर चला जाएगा ये वक्त बहकर मंजिल नहीं मुश्किल भी इतनी मिलता है फल हर दर्द सहकर।। अरमान है कितने मगर ये पूरे न हो पाए अगर ये उलझा हूं फिर भी जग में कितना जबकि पता माया भंवर ये।। यही देह है उत्तम खजाना जग ने जिसे है व्यर्थ माना उसको पता है भेद इसका जिसने इसे गंभीर जाना।। कल ने ही छीना आज बेहतर लगता न कोई काज बेहतर

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