आत्मशांति नहीं मिल सकती

By Mukesh Negi
Sep 23 2020 1 min read

  आत्मशांति नही मिल सकती निराहार में बेशक भटक जाती है रूह दुराचार में सुख आने पर इंसान दुख को भुला देता हैं जबकि वही सुख छिपा होता है आज़ार में।। मेहरबानी है मकबूल तेरी हमेशा मुझ पर तेरा नूर छाया है इस हसीन बहार में।। दो वक्त का आलम मुझे सुकूंन तो देता है फिर भी ख्याल डगमगाता है तेरे विचार में।। खुशनसीबी का दीया अभी जलाना है बाक़ि मुझे जाना है तुरंत किसी सच्चे सालार में।। बदल नही सकता "मुकेश" अपनी फितरत खुदा उसे रहन

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